दिल भुला बैठा है सब कुछ, हादसों को छोड्कर ;
याद अब कुछ भी नहीं है,आँसुओं को छोडकर !
मज़हबों के दरमियाँ,कुछ भी न पाया दोस्तो ;
आदमी से आदमी के, फ़ासलों को छोड्कर !
ये करो, वो मत करो,कुछ जान लो, कुछ सीख लो ;
पास अब बचपन के क्या है,बंधनों को छोडकर !
वलवले जाते रहे, सपने भी सब गहरा गए ;
अब नहीं आँखों में कुछ भी,रतजगों को छोडकर !
अब न वो तड़पन, न जलती- जागती आँखों में ख़्वाब ;
दिल ‘अजय’ कितना सुखी है, ख़्वाहिशों को छोड्कर !
डा०अजय जनमेजय,बिजनौर[उ०प्र०]
Tuesday, November 30, 2010
Sunday, November 28, 2010
ग़ैर के दर्द में पागल कोई, पागल न मिला !
देख अभी इस मलबे नीचे, पत्थर और मिलें
जाने कितनी किरचें मेरे. भीतर और मिलें !
जाते जाते दी है दुनिया ! हमने एक दुआ;
चाहने वाले तुझको हमसे,बेहतर और मिलें !
रौंद चुका हूँ कितने मरुथल, जल के धोखे में;
आगे जाने कितने सूखे, सागर और मिलें !
किसको ख़बर भटकाने वाले, हम-से राही को;
रस्ता-रस्ता कितने ऎसे, रहबर और मिलें !
दुख: देने वाले से ताज़ा चोटें माँग अजय;
इन खाली आँखों को मोती-गौहर और मिलें !
डा० अजय जनमेजय {बिजनोर}
जाने कितनी किरचें मेरे. भीतर और मिलें !
जाते जाते दी है दुनिया ! हमने एक दुआ;
चाहने वाले तुझको हमसे,बेहतर और मिलें !
रौंद चुका हूँ कितने मरुथल, जल के धोखे में;
आगे जाने कितने सूखे, सागर और मिलें !
किसको ख़बर भटकाने वाले, हम-से राही को;
रस्ता-रस्ता कितने ऎसे, रहबर और मिलें !
दुख: देने वाले से ताज़ा चोटें माँग अजय;
इन खाली आँखों को मोती-गौहर और मिलें !
डा० अजय जनमेजय {बिजनोर}
Wednesday, November 10, 2010
माँ शारदे
शारदे माँ, शारदे माँ
ज्ञान का तू दान दे माँ ।
हम सभी के ग़म उठा लें
आँख के आँसू चुरा लें
नेक हों हम, एक हों हम
ये हमें वरदान दे माँ ।
सर हिमालय का झुके ना
प्यार की गंगा रुके ना
विश्व सारा गुनगुनाए
भारती, जय गान दे माँ ।
पीर में भी धीर हों हम
धीर हों, गम्भीर हों हम
हों समर्पित देश-हित हम
बस यही तू आन दे माँ ।
ज्ञान का तू दान दे माँ ।
हम सभी के ग़म उठा लें
आँख के आँसू चुरा लें
नेक हों हम, एक हों हम
ये हमें वरदान दे माँ ।
सर हिमालय का झुके ना
प्यार की गंगा रुके ना
विश्व सारा गुनगुनाए
भारती, जय गान दे माँ ।
पीर में भी धीर हों हम
धीर हों, गम्भीर हों हम
हों समर्पित देश-हित हम
बस यही तू आन दे माँ ।
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