Tuesday, November 30, 2010

[ग़ज़ल]अब नहीं आँखों में कुछ भी,रतजगों को छोडकर !

दिल भुला बैठा है सब कुछ, हादसों को छोड्कर ;
याद अब कुछ भी नहीं है,आँसुओं  को छोडकर  !


मज़हबों के दरमियाँ,कुछ भी न पाया दोस्तो ;
आदमी से आदमी के, फ़ासलों     को छोड्कर  !

ये करो, वो मत करो,कुछ जान लो, कुछ सीख लो ;
पास अब बचपन के क्या है,बंधनों    को छोडकर  !

वलवले   जाते    रहे, सपने    भी सब     गहरा   गए ;
अब नहीं आँखों में कुछ भी,रतजगों को छोडकर !


अब न वो तड़पन, न जलती- जागती आँखों में ख़्वाब ;
दिल ‘अजय’ कितना सुखी है, ख़्वाहिशों     को छोड्कर !


डा०अजय जनमेजय,बिजनौर[उ०प्र०]

Sunday, November 28, 2010

ग़ैर के दर्द में पागल कोई, पागल न मिला !

देख अभी इस मलबे नीचे, पत्थर और मिलें
जाने कितनी किरचें मेरे. भीतर और मिलें  !

जाते जाते दी है दुनिया ! हमने एक दुआ;
चाहने वाले तुझको हमसे,बेहतर और मिलें  !

रौंद चुका हूँ कितने मरुथल, जल के धोखे में;
आगे जाने कितने सूखे,  सागर और मिलें  !

किसको ख़बर भटकाने वाले, हम-से राही को;
रस्ता-रस्ता कितने ऎसे, रहबर और मिलें  !

दुख: देने वाले से ताज़ा चोटें माँग  अजय;
इन खाली आँखों को मोती-गौहर और मिलें  !
   
     डा० अजय जनमेजय {बिजनोर}

Wednesday, November 10, 2010

माँ शारदे

शारदे माँ, शारदे माँ
ज्ञान का तू दान दे माँ ।


हम सभी के ग़म उठा लें
आँख के आँसू चुरा लें
नेक हों हम, एक हों हम
ये हमें वरदान दे माँ ।


सर हिमालय का झुके ना
प्यार की गंगा रुके ना
विश्व सारा गुनगुनाए
भारती, जय गान दे माँ ।


पीर में भी धीर हों हम
धीर हों, गम्भीर हों हम
हों समर्पित देश-हित हम
बस यही तू आन दे माँ ।