देख अभी इस मलबे नीचे, पत्थर और मिलें
जाने कितनी किरचें मेरे. भीतर और मिलें !
जाते जाते दी है दुनिया ! हमने एक दुआ;
चाहने वाले तुझको हमसे,बेहतर और मिलें !
रौंद चुका हूँ कितने मरुथल, जल के धोखे में;
आगे जाने कितने सूखे, सागर और मिलें !
किसको ख़बर भटकाने वाले, हम-से राही को;
रस्ता-रस्ता कितने ऎसे, रहबर और मिलें !
दुख: देने वाले से ताज़ा चोटें माँग अजय;
इन खाली आँखों को मोती-गौहर और मिलें !
डा० अजय जनमेजय {बिजनोर}
1 comment:
डॊ,साहब ! बहुत अच्छी ग़ज़ल है । ’किसको खबर भटकाने वाले’ की जगह शायद ’भटकने वाले’ होगा ।
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