Tuesday, November 30, 2010

[ग़ज़ल]अब नहीं आँखों में कुछ भी,रतजगों को छोडकर !

दिल भुला बैठा है सब कुछ, हादसों को छोड्कर ;
याद अब कुछ भी नहीं है,आँसुओं  को छोडकर  !


मज़हबों के दरमियाँ,कुछ भी न पाया दोस्तो ;
आदमी से आदमी के, फ़ासलों     को छोड्कर  !

ये करो, वो मत करो,कुछ जान लो, कुछ सीख लो ;
पास अब बचपन के क्या है,बंधनों    को छोडकर  !

वलवले   जाते    रहे, सपने    भी सब     गहरा   गए ;
अब नहीं आँखों में कुछ भी,रतजगों को छोडकर !


अब न वो तड़पन, न जलती- जागती आँखों में ख़्वाब ;
दिल ‘अजय’ कितना सुखी है, ख़्वाहिशों     को छोड्कर !


डा०अजय जनमेजय,बिजनौर[उ०प्र०]

1 comment:

Creative Manch said...

मज़हबों के दरमियाँ,कुछ भी न पाया दोस्तो ;
आदमी से आदमी के, फ़ासलों को छोड्कर !
वलवले जाते रहे, सपने भी सब गहरा गए ;
अब नहीं आँखों में कुछ भी,रतजगों को छोडकर !

वाह,,वाह बहुत खूब
अजय जन्मेजय जी आपने बहुत सुन्दर लिखा है
बहुत पसंद आई रचना
आभार