Sunday, November 28, 2010

ग़ैर के दर्द में पागल कोई, पागल न मिला !

देख अभी इस मलबे नीचे, पत्थर और मिलें
जाने कितनी किरचें मेरे. भीतर और मिलें  !

जाते जाते दी है दुनिया ! हमने एक दुआ;
चाहने वाले तुझको हमसे,बेहतर और मिलें  !

रौंद चुका हूँ कितने मरुथल, जल के धोखे में;
आगे जाने कितने सूखे,  सागर और मिलें  !

किसको ख़बर भटकाने वाले, हम-से राही को;
रस्ता-रस्ता कितने ऎसे, रहबर और मिलें  !

दुख: देने वाले से ताज़ा चोटें माँग  अजय;
इन खाली आँखों को मोती-गौहर और मिलें  !
   
     डा० अजय जनमेजय {बिजनोर}

1 comment:

शरद तैलंग said...

डॊ,साहब ! बहुत अच्छी ग़ज़ल है । ’किसको खबर भटकाने वाले’ की जगह शायद ’भटकने वाले’ होगा ।