दिल भुला बैठा है सब कुछ, हादसों को छोड्कर ;
याद अब कुछ भी नहीं है,आँसुओं को छोडकर !
मज़हबों के दरमियाँ,कुछ भी न पाया दोस्तो ;
आदमी से आदमी के, फ़ासलों को छोड्कर !
ये करो, वो मत करो,कुछ जान लो, कुछ सीख लो ;
पास अब बचपन के क्या है,बंधनों को छोडकर !
वलवले जाते रहे, सपने भी सब गहरा गए ;
अब नहीं आँखों में कुछ भी,रतजगों को छोडकर !
अब न वो तड़पन, न जलती- जागती आँखों में ख़्वाब ;
दिल ‘अजय’ कितना सुखी है, ख़्वाहिशों को छोड्कर !
डा०अजय जनमेजय,बिजनौर[उ०प्र०]
1 comment:
मज़हबों के दरमियाँ,कुछ भी न पाया दोस्तो ;
आदमी से आदमी के, फ़ासलों को छोड्कर !
वलवले जाते रहे, सपने भी सब गहरा गए ;
अब नहीं आँखों में कुछ भी,रतजगों को छोडकर !
वाह,,वाह बहुत खूब
अजय जन्मेजय जी आपने बहुत सुन्दर लिखा है
बहुत पसंद आई रचना
आभार
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