Thursday, December 27, 2012

चला न कोई मन्त्र ======
२७-१२-२०१२ 
सूरज को अगवा किया ,  रचा नया षड्यंत्र |
सब पर छाया कोहरा ,चला  न  कोई मन्त्र |
चला न कोई मन्त्र , शीत  है  छुरियां घोपे |
जर्सी स्वेटर आम , निकल  आये  हैं  टोपे |
सहने को मजबूर ,करें क्या किससे शिकवा |
करें कहाँ फरियाद ,किया सूरज को अगवा ||

डॉ अजय जनमेजय 

Wednesday, December 26, 2012

88 के हुए अटल ======
२५-१२-२०१२ 
अठ्ठासी अब साल के ,हुए अटल जी आज |
कहें विरोधी आपके , इनके अच्छे काज |
इनके अच्छे काज , सदा से सबके प्यारे |
चाहे दल हों भिन्न ,देश के राज - दुलारे |
राजनीत में आप,जिए ज्यों इक सन्यासी |
शतक करेंगे पूर्ण , हुए हैं साल अठ्ठासी ||

डॉ अजय जनमेजय
हाथी दादा जब चले26-12-2012 

हाथी दादा जब चले ,कर मस्तानी चाल |

भागीं घर से चीटियाँ , हो डर से बेहाल |
हो डर से बेहाल ,रास्ता अपना बदलो |
बड़े तुम्हारे पैर ,न दादा हमको कुचलो |
या फिर घुसकर सूंड ,कराएँ तुमसे वादा |
बदलो अपनी राह , निवेदन हाथी दादा ||

डॉ अजय जनमेजय

Monday, December 24, 2012

कुहरे की चादर ====
२४-१२-२०१२ 

कुहरे की चादर हटी ,मिली धरा को धुप |
चहरे सबके खिल उठे , पाया रूप अनूप |
पाया रूप अनूप , छतों  पर दिए दिखाई |
लिए हाथ में बेट , टीम  बच्चों  की आई |
बहुत दिनों के बाद ,दिखा गंगा का खादर |
निकली प्यारी धूप ,फाड़ कुहरे की चादर 

डॉ ० अजय जनमेजय 

Sunday, December 23, 2012

गुट बंदी दल के लिए ,है जी का जंजाल |
हर दल को दलदल बना ,कर देती कंगाल |
कर देती कंगाल ,एकता बात न सूझे |
विघटन होते रोज़ ,प्यार कब कोई  बूझे |
नियम ,सोच ,सम्मान ,साथ में हो पावंदी |
प्रथम सोच गर देश ,न पनपे फिर गुट बंदी 

              (२)
ढेले -ढेले है सजा ,क्या  सुन्दर  अमरुद |
गुण से ही है बच सका ,इसका आज बजूद |
इसका  आज बजूद ,भरे गुण इतने सारे |
रोगी जिनका पेट ,ये उनके कष्ट  निवारे |
मिले नगर ओ गाँव ,कहीं भी कोई लेले |
गज़ब  जायकेदार  , लदे  हैं  सारे   ढेले |

          (३)
जाड़े  आये  सज गया , पटरी  का  बाज़ार |
मुफ्लिस के भी घर मना ,आज एक त्यौहार |
आज एक  त्यौहार , गरम  कपडे  वो लाया |
खुश बच्चों को देख ,सुकू ,इक दिल में पाया |
सिकुड़ा  देख  गरीब , ठण्ड  भी  पढ़े  पहाड़े  |
धनवानों  की  मौज , रंक  के  दुखिया जाड़े ||
२०-११-२०१२|

भारत माता को नमन ,करें सुबह ओ शाम |
सांसे  ओ जीवन दिया ,दिया सभी को नाम |
दिया सभी को नाम ,है खुद इक तारा  नभ की |
नानक ईशा  राम ,मोहम्मद ,जी की सबकी |
बांटे केवल   प्यार , द्वेष  कब   इसको  भाता |
करते तेरे लाल ,नमन सब भारत माता ||

डॉ -अजय जनमेजय 
सीधी सच्ची मित्रता ,है सुख का आगार |
कर लेते  कुछ लोग पर ,इसका भी  व्यापार |
इसका भी  व्यापार ,मित्रता भाव लजाते |
ऐसा करके लोग ,तनिक भी कब शरमाते |
कब खोले है मित्र ,मित्र की बातें कच्ची |
रिश्तों की शिरमौर ,मित्रता होती सच्ची  |

डॉ अजय जनमेजय 

पूजा कन्या की करें ,विधि विधान के संग |
आदि शक्ति माता भरें ,खुशियों के सब रंग |
खुशियों के सब रंग ,ज़िन्दगी में आ जाते  |
पूजन नौ दिवसीय ,पूर्ण  मन से कर पाते |
नवरात्रों  में पूज्य ,न कोई माँ सा दूजा  |
भोजन ,आदर ,भेंट ,करें कन्या की पूजा |

   डॉ -अजय जनमेजय 
शारदीय नवरात्र पर आप सभी को मंगल कामनाएँ१६-१०-२०१२ 

शक्ति स्वरूपा माँ  तुम्हे ,करता बारम्बार |
मधु कैटभ संहारिणी ,नमन करो स्वीकार |
नमन करो स्वीकार ,है माता सिद्धिदायक|
ख़ड़ी द्वार संतान ,मात तुम तो फलदायक |
रखो [प्यार का भाव ,न कोई तुमसा दूजा |
करूँ करूँ हर बार , नमन मैं  शक्ति स्वरूपा |

डॉ -अजय जनमेजय
 

23-12-2012 

जीवन शैली ,में मदद ,तभी मज़ा है यार |

हाथ बढाकर देखिये ,सुन्दर ये संसार |
सुन्दर ये संसार ,मदद को रहिये तत्पर |
मिलकर उठते आज , गाँव्  में अब भी छप्पर |
जीवन न हो जाय ,हुई ज्यों गंगा  मैली |
बनिए बस इंसान ,बदलिए जीवन शैली ||

डॉ -अजय जनमेजय 
23-12-2012 

भाषाई सोहाद्र की ,बड़ी जरूरत यार |

भाषाओं के प्रेम से ,सुन्दर ये संसार |
सुन्दर ये संसार ,बहिन हैं उर्दू  हिंदी |
इक माँ का गलहार ,एक माथे की बिंदी|
बँट जाते हैं लोग ,न समझें जो सच्चाई |
बड़ा जरूरी आज ,प्रेम समझो भाषाई |

डॉ -अजय जनमेजय 
23-12-2012

शिक्षा से सम्पूर्णता ,नए क्षितिज के द्वार |
नए नए फिर द्वार से  ,खुलता ये संसार |
खुलता ये संसार ,ज्ञान से ज्ञानी बनता  |
अनपढ़ तो इंसान ,रहे खुद का सुख हंता |
जाहिल के दो हाथ ,पेट को माँगे भिक्षा  |
पर सुखमय संसार ,हाथ में देती शिक्षा |

डॉ -अजय जनमेजय 
बढते -बढते ========
23 -१२-२०१२
बढते -बढते  बढ़ गई,लो मौसम में ठण्ड |
पशु -पक्षी  ओ निर्धनों ,पर है सारा दण्ड  |
पर है  सारा  दण्ड , भूख पर पड़ती भारी |
कम  होता  है  काम , और  ये हाहाकारी |
आता है कुछ साँस,सूर्य के  चढ़ते -चढ़ते |
बने यही तलवार ,रात के  बढते - बढते  |

डॉ अजय  जनमेजय 


23-12-2012
गज़क  रेवड़ी  से  भरा , देखो तो  बाज़ार |

रानी हैं ये  शीत  की , इनका   ये  संसार |
इनका ये  संसार , मूंगफली   भी इतराए |
हलुआ गाजर ,मूंग ,स्वाद  में रंग जमाये |
मक्का रोटी ,साग ,बगड ,गुड ,जमी चौकड़ी |
बढती मन में चाह , देखकर  गज़क रेवड़ी |

डॉ अजय जनमेजय 

२३-१२-

बूँदा- बांदी से बढ़ी ,बढ़ी और  भी  शीत |
शाला की छुट्टी हुई ,हुई  खेल  की जीत |
हुई खेल की जीत ,बनी  पर  बूंदे बाधा ||
घर के भीतर खेल,मज़ा आ पाया आधा |
गए नहीं मैदान ,नहीं  की  कूदा  फांदी |
छुट्टी लेकर आज ,मिली पर बूँदा -बांदी |

डॉ अजय जनमेजय 

मानस वंदन ==========

23-१२ -२०१२ 

मानस वंदन से मिला ,मिला जिन्हें अमरत्व |
जीते  जी ही  मोक्ष  है , जो  ये समझा  तत्व ||
जो ये समझा तत्व , न  भटका फिर वो जंगल |
जिसका हो ये ध्येय , करूं   मैं  सबका मंगल |
सुगम बनें सब राह , न  आती  कोई अड़चन |
मन   में उतरें देव , करें  जब  मानस  वंदन |

डॉ अजय जनमेजय  

जाड़े की दादागिरी=============
23-12-2012
जाड़े की  दादागिरी  , काँपे  नन्हे  पात |
बिन कपड़ों के रात भर , सोये नंगे गात |
सोये नंगे गात ,अलसुबह  ओस  नहाए |
कितने हैं चुपचाप ,हों मानों ध्यान लगाऐ |
पाकर मूक गरीब , पढ़ाती  ठण्ड  पहाड़े |
पैसा जिनके पास , उन्हें  तो भाते  जाड़े ||

डॉ ०  अजय जनमेजय  

Saturday, December 22, 2012

मानस वंदन =================
22-12-2012



मानस वंदन से बड़ा , यहाँ  न  कोई सत्य |
कहा बड़ों ने ठीक ये ,कितना सुन्दर कथ्य |
कितना सुन्दर कथ्य ,करो ओ खुशियाँ पाओ |
बना इसी को  ध्येय , धरा  सारी  महकाओ |
जिनके ऐसे  भाव , सदा  होता अभिनन्दन |
मिलती ख़ुशी अपार ,करें जब मानस वंदन ||

डॉ अजय जनमेजय