Sunday, December 23, 2012

बढते -बढते ========
23 -१२-२०१२
बढते -बढते  बढ़ गई,लो मौसम में ठण्ड |
पशु -पक्षी  ओ निर्धनों ,पर है सारा दण्ड  |
पर है  सारा  दण्ड , भूख पर पड़ती भारी |
कम  होता  है  काम , और  ये हाहाकारी |
आता है कुछ साँस,सूर्य के  चढ़ते -चढ़ते |
बने यही तलवार ,रात के  बढते - बढते  |

डॉ अजय  जनमेजय 

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