गुट बंदी दल के लिए ,है जी का जंजाल |
हर दल को दलदल बना ,कर देती कंगाल |
कर देती कंगाल ,एकता बात न सूझे |
विघटन होते रोज़ ,प्यार कब कोई बूझे |
नियम ,सोच ,सम्मान ,साथ में हो पावंदी |
प्रथम सोच गर देश ,न पनपे फिर गुट बंदी
(२)
ढेले -ढेले है सजा ,क्या सुन्दर अमरुद |
गुण से ही है बच सका ,इसका आज बजूद |
इसका आज बजूद ,भरे गुण इतने सारे |
रोगी जिनका पेट ,ये उनके कष्ट निवारे |
मिले नगर ओ गाँव ,कहीं भी कोई लेले |
गज़ब जायकेदार , लदे हैं सारे ढेले |
(३)
जाड़े आये सज गया , पटरी का बाज़ार |
मुफ्लिस के भी घर मना ,आज एक त्यौहार |
आज एक त्यौहार , गरम कपडे वो लाया |
खुश बच्चों को देख ,सुकू ,इक दिल में पाया |
सिकुड़ा देख गरीब , ठण्ड भी पढ़े पहाड़े |
धनवानों की मौज , रंक के दुखिया जाड़े ||
हर दल को दलदल बना ,कर देती कंगाल |
कर देती कंगाल ,एकता बात न सूझे |
विघटन होते रोज़ ,प्यार कब कोई बूझे |
नियम ,सोच ,सम्मान ,साथ में हो पावंदी |
प्रथम सोच गर देश ,न पनपे फिर गुट बंदी
(२)
ढेले -ढेले है सजा ,क्या सुन्दर अमरुद |
गुण से ही है बच सका ,इसका आज बजूद |
इसका आज बजूद ,भरे गुण इतने सारे |
रोगी जिनका पेट ,ये उनके कष्ट निवारे |
मिले नगर ओ गाँव ,कहीं भी कोई लेले |
गज़ब जायकेदार , लदे हैं सारे ढेले |
(३)
जाड़े आये सज गया , पटरी का बाज़ार |
मुफ्लिस के भी घर मना ,आज एक त्यौहार |
आज एक त्यौहार , गरम कपडे वो लाया |
खुश बच्चों को देख ,सुकू ,इक दिल में पाया |
सिकुड़ा देख गरीब , ठण्ड भी पढ़े पहाड़े |
धनवानों की मौज , रंक के दुखिया जाड़े ||
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